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रविवार, 9 जून 2019

JusticeForTwinkle

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*(नन्ही ट्विंकल की निर्मम हत्या पर सरकार,समाज को जगाती, दोगलों को धिक्कारती एक आवश्यक कविता)*

*तीन बरस की गुड़िया तिल तिल मरके आखिर चली गयी,*  
*आज अली के गढ़ में बिटिया राम कृष्ण की छली गयी,*

नन्हे नन्हे पंख उखाड़े, मज़हब के मक्कारों ने,  
देखो कैसे ईद मनाई,दो दो रोज़ेदारों ने,

*कोमल अंग काट कर खाये, कुत्तों ने इफ्तारों में,*  
*नोच कुचल कर लाश फेंक दी रमजानी बाज़ारो में*

आस्तीन में खंज़र रखकर कलियों से गुलफाम मिले,  
हमको देखो कैसे भाई चारे के परिणाम मिले,

*आओ थोड़ा शोर मचा लें,हम अपनी लाचारी पे,*  
*चार दिवस हो हल्ला कर लें,उस ज़ाहिद व्यभिचारी पर,*

लेकिन हम कब समझेंगे,मज़हब के कुटिल इरादों को,  
तहज़ीबें जो सीखा गयी हैं दहशत कत्ल फसादों को,

*पूछ रहा हूँ,कहाँ मर गए कठुआ पर रोने वाले,*  
*शर्मिंदा होने की तख्ती छाती पर ढोने वाले,*

बॉलीवुड के बेशर्मो की टोली आखिर कहां गयी,  
और दोगलों की वो सूरत भोली आखिर कहां गयी,

*स्वरा भास्कर कहाँ मर गयी,कहाँ गया वो ददलानी,*  
*तैमूरी अम्मा गायब है,कहाँ गयी सोनम रानी,*

टीवी वाले वो रवीश क्या जीभ कटाने चले गए,  
डी जे वाले बाबू भी क्या बेस घटाने चले गए,

*कहाँ गया बेगूसराय का किशन कन्हैया ढूंढों तो,*  
*और आसिफा पर रोता वो राहुल भैया ढूंढो तो,*

कोई नही मिलेगा,सबने पट्टी आंख लपेटी है,  
क्योंकि अभागिन ट्विंकल देखो इक हिन्दू की बेटी है,

*और किसी हिन्दू की बेटी इसी हश्र को पाएगी,*  
*अरबी आयत पढ़ के देखो,समझ तुम्हे आ जायेगी,*

सोच रहा था योगी जैसा हिन्दू शेर दहाड़ेगा,  
मोदी अपना जेहादी गुर्गों के जबड़े फाडेगा,

*लेकिन ये भी जब्त हो गए वोट बैंक के बक्से में,*  
*पाकिस्तान नज़र आता है अब भारत के नक्से में,*

ईद सवेरे देखो बस में तोड़ फोड़ की जाती है,  
सड़कों पर होती नमाज़ फिर जाम रोड हो जाती है,

*सोच था छुटकारा होगा अब जेहादी रोगी से,*  
*सन्नाटे की आस नही थी हमको मोदी योगी से,*

ये कौमी भेड़िये,बुझेगी इन सबकी ना प्यास कभी,  
जीत नही पाओगे मोदी इन सबका विश्वास कभी,

*ट्विंकल बिटिया चीख रही है,इंसाफी दरबारों में,*  
*कुछ ऐसा कर दो,भय भर दो इन दुष्टों गद्दारों में,*

ऐसी आग लगा दो मोदी इस जेहादी जंगल को,  
कोई ज़ाहिद आंख उठाकर देख न पाए ट्विंकल को,

*वरना यूँ ही सिर्फ आंसुओं से ज़ख्मो को धोएंगे,*  
*आज किसी ट्विंकल पर,कल सीता गीता पर रौएँगे,*  

*----------✍कवि गौरव चौहान*

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